Friday, 30 June 2017

नागार्जुन/ Nagarjun /Great Poet Nagarjun

30 जून 1911 के दिन ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का चन्द्रमा हिन्दी काव्य जगत के उस दिवाकर के उदय का साक्षी था, जिसने अपनी फ़क़ीरी और बेबाक़ी से अपनी अनोखी पहचान बनाई।

नागार्जुन ने 1945 ई. के आसपास साहित्य सेवा के क्षेत्र में क़दम रखा। शून्यवाद के रूप में नागार्जुन का नाम विशेष उल्लेखनीय है। नागार्जुन का असली नाम 'वैद्यनाथ मिश्र' था।
हिन्दी साहित्य में उन्होंने 'नागार्जुन' तथा मैथिली में 'यात्री' उपनाम से रचनाओं का सृजन किया।

कबीर की पीढ़ी का यह महान कवि नागार्जुन के नाम से जाना गया। मधुबनी ज़िलेके 'सतलखा गाँव' की धरती बाबा नागार्जुन की जन्मभूमि बन कर धन्य हो गई। ‘यात्री’ आपका उपनाम था और यही आपकी प्रवृत्ति की संज्ञा भी थी। परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने वाले बाबा नागार्जुन हिन्दी, मैथिली, संस्कृत तथा बांग्ला में कविताएँ लिखते थे।

मैथिली भाषा में लिखे गए आपके काव्य संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिन्दी काव्य-मंच पर अपनी सत्यवादिता और लाग-लपेट से रहित कविताएँ लम्बे युग तक गाने के बाद 5 नवम्बर सन् 1998 को ख्वाजा सराय, दरभंगा, बिहार में यह रचनाकार हमारे बीच से विदा हो गया।

उनके स्वयं कहे अनुसार उनकी 40 राजनीतिक कविताओं का चिरप्रतीक्षित संग्रह ‘विशाखा’ आज भी उपलब्ध नहीं है। संभावना भर की जा सकती है कि कभी छुटफुट रूप में प्रकाशित हो गयी हो, किंतु वह इस रूप में चिह्नित नहीं है। यानि तीसरा संग्रह अब भी प्रतीक्षित ही मानना चाहिए। हिंदी में उनकी कई काव्य पुस्तकें हैं।
ये सभी जानते हैं. उनकी प्रमुख रचना-भाषाएं मैथिली और हिंदी ही रही हैं। मैथिली उनकी मातृभाषा है और हिंदी राष्ट्रभाषा के महत्व से उतनी नहीं जितनी उनके सहज स्वाभाविक और कहें तो प्रकृत रचना-भाषा के तौर पर उनके बड़े काव्यकर्म का माध्यम बनी। अबतक प्रकाश में आ सके उनके समस्त लेखन का अनुपात विस्मयकारी रूप से मैथिली में बहुत कम और हिंदी में बहुत अधिक है। अपनी प्रभावान्विति में ‘अकाल और उसके बाद’ कविता में अभिव्यक्त नागार्जुन की करुणा साधारण दुर्भिक्ष के दर्द से बहुत आगे तक की लगती है। 'फटेहाली' महज कोई बौद्धिक प्रदर्शन है। इस पथ को प्रशस्त करने का भी मैथिली-श्रेय यात्री जी को ही है।

नागार्जुन को 1965 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से उनके ऐतिहासिक मैथिली रचना पत्रहीन नग्न गाछ के लिए 1969 में नवाजा गया था। उन्हें साहित्य अकादमी ने 1994 में साहित्य अकादमी फेलो के रूप में सम्मानित किया।

तो आइये आज इस महान जनकवि की 106 वीं जयंती पर पढ़ते है
सत्य, बातें और भी कई  कविताएं….


सत्य

सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी-फटी आँखों से
टुकुर-टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए-जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फ़र्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा-सारा दिन, सारी-सारी रात

सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग़ की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया है
कौर अंदर डालकर जबड़ों को झटका देना पड़ता है
तब जाकर खाना गले के अंदर उतरता है
ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सत्य को लकवा मार गया है

वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा-सारा दिन, सारी-सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक
लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है

जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है
उसे इमर्जेंसी का शाक लगा है
लगता है, अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ, सत्य अब पड़ा रहेगा
लोथ की तरह, स्पंदनशून्य मांसल देह की तरह!

बातें

बातें -
हँसी में धुली हुईं
सौजन्य चंदन में बसी हुई
बातें -
चितवन में घुली हुईं
व्यंग्य बंधन में कसी हुईं
बातें -
उसाँस में झुलसीं
रोष की आँच में तली हुईं
बातें -
चुहल में हुलसीं
नेह-साँचे में ढली हुईं
बातें -
विष की फुहार-सी
बातें -
अमृत की धार-सी
बातें -
मौत की काली डोर-सी
बातें -
जीवन की दूधिया हिलोर-सी
बातें -
अचूक वरदान-सी
बातें -
घृणित नाबदान-सी
बातें -
फलप्रसू, सुशोभन, फल-सी
बातें -
अमंगल विष-गर्भ शूल-सी
बातें -
क्य करूँ मैं इनका?
मान लूँ कैसे इन्हें तिनका?
बातें -
यही अपनी पूँजी, यही अपने औज़ार
यही अपने साधन, यही अपने हथियार
बातें -
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
बना लूँ वाहन इन्हें घुटन का, घिन का?
क्या करूँ मैं इनका?
बातें -
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
स्तुति करूँ रात की, ज़िक्र न करूँ दिन का?
क्या करूँ मैं इनका?


उनको प्रणाम!

जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम।

कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए!
उनको प्रणाम!

जो छोटी-सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि-पार,
मन की मन में ही रही, स्वयं
हो गए उसी में निराकार!
उनको प्रणाम!

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह-रह नव-नव उत्साह भरे,
पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे!
उनको प्रणाम

एकाकी और अकिंचन हो
जो भू-परिक्रमा को निकले,
हो गए पंगु, प्रति-पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले!
उनको प्रणाम

कृत-कृत नहीं जो हो पाए,
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल!
उनको प्रणाम!

थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ,
या जन्म-काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहाँत हुआ!
उनको प्रणाम

दृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति-मंत?
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत!
उनको प्रणाम!

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर-चूर!

उनको प्रणाम!



भूल जाओ पुराने सपने


सियासत में
न अड़ाओ
अपनी ये काँपती टाँगें
हाँ, मह्राज,
राजनीतिक फतवेवाजी से
अलग ही रक्खो अपने को
माला तो है ही तुम्हारे पास
नाम-वाम जपने को
भूल जाओ पुराने सपने को
न रह जाए, तो-
राजघाट पहुँच जाओ
बापू की समाधि से जरा दूर
हरी दूब पर बैठ जाओ
अपना वो लाल गमछा बिछाकर
आहिस्ते से गुन-गुनाना :
‘‘बैस्नो जन तो तेणे कहिए
जे पीर पराई जाणे रे’’
देखना, 2 अक्टूबर के
दिनों में उधर मत झाँकना
-जी, हाँ, महाराज !
2 अक्टूबर वाले सप्ताह में
राजघाट भूलकर भी न जाना
उन दिनों तो वहाँ
तुम्हारी पिटाई भी हो सकती है
कुर्ता भी फट सकता है

हां, बाबा, अर्जुन नागा !

Tuesday, 27 June 2017

मैं नहीं लिखता पैसों के लिए -- अनुज पारीक



नहीं लिखता मैं पैसों के लिए 
ना  ही लिखता हूँ नाम के लिए 
मैं तो लिखता हूँ सिर्फ सुकून के लिए 
लिखने की प्यास को शांत करने के लिए 

लिखता हूँ सिर्फ अच्छाई के लिए 
लिखता हूँ बदलाव के लिए 
नहीं लिखता हूँ मैं पैसों के लिए 

या फिर सिर्फ यही एक रास्ता है 
नाम के लिए, पहचान के लिए 
मैं तो लिखता हूँ 
ज़िंदा रहने के लिए 
या फिर जीने के लिए 
लिखता हूँ मैं जो शब्द ज़हन में है मेरे 
नहीं लिखता मैं पैसों के लिए ......

लिखता हूँ मैं उस गरीब की आवाज़ के लिए 
लिखता हूँ उस गली के कचरा बीनने वाले के लिए 
लिखता हूँ उस दुखी अन्नदाता किसान के लिए 
नहीं लिखता मैं पैसों के लिए 
ना  ही लिखता हूँ नाम के लिए 

लिखता हूँ उनके लिए 
जिनकी आवाज़ को दबा दिया 
गरीब का नाम देकर 
कमज़ोर का नाम देकर 
एक सच्चा कलमकार हूँ 
लिखता नहीं नाम, दौलत, शौहरत या फिर हवस के लिए ..
जब तक ज़िंदा हूँ लिखता रहूंगा 
उस अनाथ के लिए 
उस मज़बूर किसान के लिए 
क्योकि  नहीं लिखता मैं पैसों के लिए 
ना  ही लिखता हूँ नाम के लिए ....
© अनुज पारीक 

Saturday, 24 June 2017

Dhun

ज़िन्दगी में किसी मंज़िल तक जाना हो या किसी मुक़ाम को पाना हो ज़रूरी है धुन
DhunZindagi

AIM
Target
Success
Achive
Dream

Sun Zara / सांसों की आहट तो सुन ज़रा - अनुज पारीक

उदासियां तू भी तो सुन ज़रा
बेवजह मत लगा खामोशियों का इल्ज़ाम मुझ पर
सांसों की आहट तो सुन ज़रा
Dhun Poetry
MyWORDIsMyWORLD
DhunZindagi

Saturday, 17 June 2017

परिवार का ख़्याल जो हरदम सताता - अनुज पारीक / Father Poetry Anuj Pareek

फटी एड़ियां 
घिसी चप्पलें 
पसीने से भी रहता तर-बतर
खूब पसीना मेहनत करता 
परिवार की ज़रूरतें ही नहीं बच्चों की ख़्वाहिशें भी पूरी करता
मुस्कुराकर हर दर्द छुपाता 
पूछने पर बस कुछ नहीं यूं ही हर मर्ज़ छुपाता
तपती धूप में मेहनत से शायद इसलिए भी जी नहीं चुराता 
परिवार का ख़्याल जो हरदम सताता
खूब पसीना बहाता 
मेहनत करता 
परिवार की ज़रूरतें ही नहीं बच्चों की ख़्वाहिशें भी पूरी करता
पाई-पाई जोड़कर जो भी थोड़ा बहुत बचाता 
फिर भी पूरा कुछ ना हो पाता
पता नहीं कैसे हिम्मत जुटाता 
कहीं से उधार कहीं ब्याज़ से पैसा वो लाता
बेटी का ब्याह भी रचाता 
बेटे को भी पढ़ा- लिखाकर क़ाबिल बनाता
खूब पसीना बहाता 
मेहनत करता 
परिवार की ज़रूरतें ही नहीं बच्चों की ख़्वाहिशें भी पूरी करता ।।
--  © अनुज पारीक --
 Anuj Pareek
Creative Writer,Poet

अन्नदाता / Kisan - Anuj Pareek

सियासत ने भी क्या खेल रचाया
निवाला देने वालों का ही खून बहाया
--- अनुज पारीक ---

पिता / Father

परिवार की शान है पिता
त्याग और समर्पण की खान है
पिता महज़ शब्द नहीं पूरा आसमान है

#Father #FatherLove #Papa #MerePapa
#FathersDay #Poetry 

Thursday, 8 June 2017

Feel Soul / ना तू अजनबी - अनुज पारीक


ना तू अजनबी है न मैं तेरे लिए अजनबी 
रूह से महसूस कर ज़रा इस रिश्ते को 
©अनुज पारीक 

Monday, 5 June 2017

Poetry On Environment / पर्यावरण की हत्या – अनुज पारीक


विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर पेश है मेरी ये कविता

अपने ही हाथों कर रहे है पर्यावरण की हत्या
पेड़ पौधों हरयाली को छोड़ कर रहे है दीवारों की रक्षा
काट रहे है पेड़ों को कर रहे है जंगलों का नाश
जो नहीं चेते अभी भी तो
हो जायेगा सब खाक जल की बूंद-बूंद को तरसेंगे हम और आप !
अनुज पारीक

#WorldEnvironmentDay
विश्व पर्यावरण दिवस
पर्यावरण की हत्या – अनुज पारीक
Poetry on World Environment Day 
Nature 
Love Nature 
NatureLover 
Dhun #SaveNature 
#SaveEnvironment
Environment Poetry by Anuj Pareek 


Sunday, 4 June 2017

Go Green Everyday Environment Day - AnujPareek

तापमान पहुंचा 50 के पार
.सी. नहीं है बचने का आधार
खुद को और आने वाली पीढ़ी को अगर विनाश से है बचाना
तो पेड़ ज़रूर लगाना - अनुज पारीक 

धुन बचाव की #SaveEnvironment #GoGreen 



आज बढ़ रहें तामपान के ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ हम है
50 के पार तो पहुँच चुका है, आने वाले कुछ ही सालों में शायद 60 या इसके भी पार
ज़रा सोचिये अपने बच्चों के बारे में कैसे सहन कर पाएंगे इतनी गर्मी क्या वो कभी माफ़ कर पाएंगे आपको
पेड़ लगाएं
आने वाले कल के लिए
अपने बच्चों के लिए 
GoGreen Dhun Bachaav Ki 


प्रकृति के विनाश से बचने का एक ही है विकल्प
पेड़ लगाने का लेना होगा संकल्प - अनुज पारीक 
धुन बचाव की #SaveEnvironment #GoGreen 


ना करों जंगलों का नाश 
हो जाएगा सब-कुछ ख़ाक 
जल की बूंद-बूंद को तरसेंगे हम और आप
अनुज पारीक 
धुन ज़िन्दगी की 
धुन बचाव की 
#EveryDayEnvironmentDay
AnujPareek 
DhunZindagiKi 
#Save #Dhun 




Saturday, 3 June 2017

Digital filmmaking


इन दिनों डिजिटल फिल्ममेकिंग बहुत ही चर्चा में है लोग फिल्म या शार्ट मूवी बनाते है फिर उसे यूट्यूब या सोशल मीडिया साइट्स फेसबुक,ट्विटर इंस्टाग्राम पर अपलोड करते हैं
अगर आज के इस दौर में डिजिटल फ़िल्ममेकिंग में करियर और इनकम की बात की जाए तो करियर के अच्छे चांस है और इनकम भी बढ़िया है
इन दिनों आ रहे High-Resolution मोबाइल कैमराज और DSLR के जरिये फिल्ममेकिंग आज एक आसान हो गयी है
और इसकी क्वालिटी भी बेहतर मिलती है
अगर आप भी डिजिटल फिल्म मेकिंग में करियर बनाना चाहते हैं तो डिजिटल फिल्म मेकिंग में किसी  अच्छे इंस्टिट्यूट से ट्रेनिंग लेकर डिजिटल फिल्म मेकर बन सकते है
जहाँ फिल्म मेकिंग से जुड़ी प्रैक्टिकल लर्निंग पर पूरा फोकस रहेगा सिर्फ फिम मेकिंग ही नहीं, पोस्ट प्रॉडक्शन, सोशल साइट्स पर अपलोड करना, इसके डिस्ट्रीब्यूशन और इससे अच्छी इनकम कमाने के बारें में भी ट्रेंड किया जाता है

Nazren / नज़रें - Anuj Pareek

                                                                अगर नज़रें रूकती है तो रुक जाने दो
                                                                   नज़रों का काम ही है नज़र करना
                                                                                    -अनुज पारीक 

World Environment Day/ विश्व पर्यावरण दिवस

दुनियाभर में 5 जून को पर्यावरण दिवस यानी विश्व पर्यावरण दिवस World Environment Day के रूप में मनाया जाता है। 
आखिर ऐसी क्या वजह थी क्या ऐसे कारण रहें की पर्यावरण दिवस मनाने की ज़रुरत हुई और इस दिन को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में पूरी दुनिया में 5 जून को मनाया जाने लगा
तो आइये जानते है किन कारणों को देखते हुए समाज के जागरूक लोगो ने एनवायरनमेंट डे मनाने को सोचा। 
पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया। 


इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का जन्म हुआ तथा प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। तथा इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को प्रेरित करना था।   
वनों की कटाई और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते स्तर को देखते हुए
पर्यावरण मुद्दों के बारे में आम लोगों को जागरुक बनाने के लिये
सुरक्षित, स्वच्छ और अधिक सुखी भविष्य का आनन्द लेने के लिये


आज बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग को देखते हुए अगर हमें आने वाली पीढ़ी को प्रकृति के विनाश से बचना है तो सिर्फ इस दिवस को मनाने इस डे को सोशल नेटवर्किंग पर पोस्ट करने और औपचारिकता से पार नहीं पड़ने वाली हम सबको अपने घर ऑफिस अपने आस-पास के परिवेश में पेड़ लगाने होंगे उनकी सुरक्षा व देखभाल करनी होगी। 

Anuj Pareek 
Dhun Zindagi Ki 
धुन बचाव की