Friday, 31 March 2017

Sensation of a Soul - Jyoti Patel

 Jyoti Patel
Author & Poetess
Email  : jyotipatel@live.in


Jyoti Patel is the contributed author and poetess of three anthologies - Pages of dairy, Dads darling daughter and Social Networking 
She is currently based in Hyderabad and pursuing second year of graduation. She is a digital advertiser and part of the organization which facilitating creative education for children from unprivileged background. She is a voracious reader and adores her collection of books. She is a Music, photography and travel enthusiastic. Sensation of a soul is her first solo book. It consists of forty three poems and eight heartwarming short stories. The poems and stories share a theme of friendship, romance, love, Hope, Faith, Desire, Dreams and life.

Starts From ..........

When I started writing from the age of fourteen, my thoughts motives and dreams were different from now.
Once came the time to drop out of  school and then I always found myself crying everyday by hiding from others in the family and all alone having no one to talk with. It was a very difficult time for me as I was always a girl who was very active, energetic and had many friends.  

Sleepless nights and endless thoughts, lonely days and big dreams!

My laptop has always been my better half from then; I found an online platform to read amazing books and to share my short stories, poetries and novels.  
This gave me the chance to publish my works online, which can be available to a wider audience. I met undiscovered and published writers from all around the world.  
I started posting chapters once in a week. The votes and comments came flooding in, not immediately but from next few days I would never experienced anything like it before. Each day I woke up to messages of encouragement from readers wanting to know "What I'm writing next" & saying "How inspiring my book is"
With such responsive audience I found myself writing faster and harder than I had ever done before. Writing has become my first priority and my life has turned around from then.  

I had many ups and downs. Today I am very much glad for everything that has happened in my life.

I'm a girl who is positive about many things of life. There are many things I like to do, to see, and to experience. I like to read and to write; I like to think and to dream; I like to talk and listen. I like to see the sunrise in the morning and the moonlight at night; I like to feel the music flowing on my face, I like to smell the wind coming from the ocean. I like to look at the clouds with a blank mind, I like to do thought experiment when I cannot sleep in middle of the night. I like flowers in spring, rain in summer, leaves in autumn, and snow in winter. I like to be alone; and to be surrounded by people. I like country speace and metropolis noise; and the view of beautiful lakes; I like the tidy flat, cornfield and the Champaign. Helping indigents always makes me happy. I like delicious food and comfortable shoes; I love good books and romantic movies. I like the land and the nature; I like to cook, sing and to smile.

My passion towards writing will always be a burning flame of my life.
I want to reach as many people as I can through my words. I would like to thank all those who read and appreciated, also the people who criticized and pulled me back.
I'm always thankful to all my readers for their love and support, those who are connected to me on social media.  
You all mean a lot to me. I hope this book gives your soul the noble warmth of feeling, spirit and courage.

Stay connected Dhun Zindagi Ki
Keep Reading and Keep Smiling  
I love you all                      



Sensation of a Soul - Jyoti Patel
Book Description 

In spite of their contrasting personas, two people gets conjoined and manifests that true love stories never have finales; and a women's fingers flings away from the keypad at the very instant of reading startling news. A man founds himself standing in silence amidst of talks, unable to react to love of his life. A couple never praises each other until someday; a guy always prefers to look up at the sky and think enormously about his darling's life and death. There are some of the sorrowful and amiable poetries and thought provoking stories. The affecting poems and captivating stories in this book share the theme of relationship, adoration, passion, love, hope, faith, desire, dreams and life. The inner meanings are even deeper than the words used in this splendid and awe-inspiring book. Sensation of a soul is sure to touch hearts of many readers; and brings out the best moments of one's life and encourages people to evaluate their inner selves and world around them with advanced eyes.









होता हूँ सेंटी - अनुज पारीक

हंसने को तो गम में भी हंस लेता हूँ ,
होता हूँ थोड़ा सेंटी तो कुछ लिख लेता हूँ ! 
अनुज पारीक
धुन ज़िन्दगी की 
धुन कविता की 


More Poetry 

Thursday, 30 March 2017

मजबूरियां

मजबूरियां जो कर देती है बेघर
छीन लेती है घर आँगन 
तिनका-तिनका बटोरतें  
समय की बारिशों ने कर दिया तर बतर   
अनुज पारीक 
धुन ज़िन्दगी की 
धुन कविता की



यह भी देखें 

चैत्र नवरात्र

नवरात्रि के 9 दिनों में देवी दुर्गा के 9 रूपों की पूजा की जाती  है।  नवरात्र के 9  दिन हमें जगाते हैं
नकारात्मक ऊर्जा का नाश कर सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं।  इन 9 दिनों में पवित्रता और शुद्धि का विशेष ध्यान रखा जाता है।  मान्यता है कि नवरात्रि में नियमोँ का विधिपूर्वक पालन और श्रद्धापूर्वक की गई पूजा से देवी दुर्गा की कृपा से साधकों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।  इससे जीवन और घर में नकारात्मक उर्जा समाप्त होती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होता है. नवरात्र में ध्यान रखी जाने वाली ख़ास बातें ......



नवरात्र में करने चाहिए ये काम--

मान्यता है कि देवी दुर्गा को लाल रंग सर्वप्रिय है, इसलिए नवरात्रि व्रतधारी को लाल रंग के आसन, पुष्प और वस्त्र का प्रयोग करना चाहिए.
प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि व्रतधारी सुबह और शाम देवी दुर्गा के मंदिर में या अपने घर के मंदिर में घी का दीपक प्रज्जवलित करते हैं और दुर्गा सप्तसती और दुर्गा चालीसा का पाठ करते हैं. फिर देवी की आरती करते हैं.
नवरात्रि में अनेक श्रद्धालु नौ दिन उपवास रखते हैं या एक समय को भोजन नहीं करते हैं या फिर केवल फलाहार पर रहते हैं.
प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों घर पर आई किसी भी कन्या को खाली हाथ विदा नहीं किया जाता है. नवरात्रि के नौवें दिन नव कन्याओं को घर बुलाकर भोजन कराया जाता है.


नहीं  करने  चाहिए  ये  काम  नवरात्रि  में---

मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि में 9 दिन दाढ़ी-मूंछ और बाल नहीं कटवाई जाती है. इन दिनों नाखून काटने के लिए भी मना किया जाता है.
जो व्रतधारी नवरात्रि में कलश स्थापना करते हैं और माता की चौकी  स्थापित करते हैं, वे इन 9 दिनों में घर खाली छोड़कर नहीं जा सकते हैं.
मान्यताओं के अनुसार इस दौरान खाने में प्याज, लहसुन और मांसाहार (नॉन-वेज) पाबन्दी होती है. केवल यही नहीं, बल्कि व्रत रखने वालों को नौ दिन तक नींबू काटने पर रोक लगा दिया जाता है. साथ ही व्रत रखने वालों को 9 दिन काले कपड़े नहीं पहनने चाहिए. उन्हें बेल्ट, चप्पल-जूते, बैग जैसी चमड़े की चीजों के इस्तेमाल से बचने के लिए कहा जाता है.
नवरात्रि व्रतधारी नौ दिनों तक खाने में अनाज और नमक का सेवन नहीं करते हैं. पौराणिक आख्यानों के अनुसार, नवरात्रि व्रत के समय दिन में सोने, तम्बाकू चबाने और ब्रह्मचर्य का पालन न करने से भी व्रत का फल नहीं मिलता है.



Tuesday, 28 March 2017

NavSamvatsar


नई चाह  
नई  राह.....
जीवन में नव प्रवाह ....
नववर्ष विक्रम संवत 2074 और
ChaitraNavratri की शुभकामनाएं
#DhunZindagiKi 

Monday, 27 March 2017

World Theater Day विश्व रंगमंच दिवस

इंफोटेन्मेंट के पिटारे में यानि जानकारी का खजाना में आज हम आपके लिए लाएं हैं वर्ल्ड थियेटर डे से जुड़ी खास जानकारी तो पढ़ते रहिए इंफोटेन्मेंट का पिटारा मेरें यानि आपके दोस्त अनुज के साथ जहां हम लाते आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आपके लिए जानकारी से भरे तथ्य ओनली ऑन धुन ज़िन्दगी की.....
क्योकि ज़िन्दगी में कुछ पाने के लिए किसी मुकाम तक जाने के लिए धुन का होना ज़रूरी हैं। तो आइये दोस्तों चलते है आज के पिटारे की ओर जहां  मैं अनुज बताऊंगा आपको विश्व रंगमंच दिवस के बारे में .......


थियेटर यानि रंगमंच एक ऐसी दुनिया या फिर यूं कहूँ ज़िंदगी जीने का सलीक़ा, तरीका जहां ज़िंदगी के हर उस किरदार को किया ही नहीं बखूबी जिया भी जाता है। दोस्तों रंगमंच एक ऐसी दुनिया जहां ज़िंदगी का हर पल जीवंत हो उठता है। सजीव हो उठता है। जिसने भी एक बार इस दुनिया में कदम रखा वो इसी दुनिया का होकर रह जाता है या यूं कहूँ रंगमंच उसकी रग-रग में बस जाता है। ठीक उसी तरह जैसे इश्क़ में प्यार होने पर प्रेमी अपनी प्रेमिका के बगेर जी नहीं पाता। थोड़ा भी दूर होने पर ज़िंदगी को जिये जाना जैसे संभव ना हो। दोस्तों ये वो दुनिया है जहां अपने नाटक के माध्यम से ना सिर्फ दुनिया को ही समझाया जा सकता है। बल्कि इंसान खुद भी ज़िंदगी को और बेहतर तरीके से समझ पाता है जी पाता है। रंगमंच भी हर आदमी के सुख-दुख, उतार-चढ़ाव, धूप-छांव आदि स्थितियों को जीने का एक ज़रिया होता है। ऐसे में इन हालात से गुज़रने वाले लोगों के बीच एक रंगकर्मी ज़िंदगी का रंगमंच छोड़ने के बाद भी ख़ुद को ज़िन्दा रख सकता है।

तो आइए जानते पहला विश्व रंगमंच दिवस कब मनाया गया

विश्व रंगमंच दिवस की स्थापना 1961 में इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी। रंगमंच से संबंधित अनेक संस्थाओं और समूहों द्वारा भी इस दिन को विशेष दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है। इस दिवस का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश है, जो विश्व के किसी जाने माने रंगकर्मी द्वारा रंगमंच तथा शांति की संस्कृति विषय पर उसके विचारों को व्यक्त करता है। 1962 में पहला अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश फ्रांस की जीन काक्टे ने दिया था। वर्ष 2002 में यह संदेश भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड द्वारा दिया गया था।
तो दोस्तों कैसा लगा आपको इंफोटेन्मेंट का पिटारा आप हमें अपनी प्रतिक्रिया ईमेल द्वारा दे सकते हैं।
हमारा ईमेल- dhunzindagiki@gmail.com
या आप निचे कमेंट बॉक्स में भी कमेंट द्वारा आपकी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
पढ़ते रहिये रोज़ाना जानकारी का खज़ाना आपके दोस्त अनुज के साथ ओनली ऑन धुन ज़िन्दगी की क्योकि ज़िन्दगी में धुन का होना ज़रूरी हैं।
अनुज पारीक
धुन ज़िन्दगी की

Sunday, 26 March 2017

महादेवी वर्मा



हिन्दी भाषा की प्रख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च, 1907, फ़र्रुख़ाबाद में हुआ। महादेवी वर्मा की गिनती हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानन्दन पन्त, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के साथ की जाती है।
आधुनिक हिंदी की सबसे सशक्त कवियित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें “आधुनिक मीराबाई ” के नाम से भी जाना जाता है। महादेवी वर्मा छायावाद व रहस्यवाद की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है।
हिन्दुस्तानी स्त्री की उदारता, करुणा, सात्विकता, आधुनिक बौद्धिकता, गंभीरता और सरलता महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व में समाविष्ट थी। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विलक्षणता से अभिभूत रचनाकारों ने उन्हें 'साहित्य साम्राज्ञी', 'हिन्दी के विशाल मंदिर की वीणापाणि', 'शारदा की प्रतिमा' आदि विशेषणों से अभिहित करके उनकी असाधारणता को लक्षित किया। महादेवी जी ने एक निश्चित दायित्व के साथ भाषा, साहित्य, समाज, शिक्षा और संस्कृति को संस्कारित किया। कविता में रहस्यवाद, छायावाद की भूमि ग्रहण करने के बावज़ूद सामयिक समस्याओं के निवारण में महादेवी वर्मा ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

शिक्षा और साहित्य प्रेम महादेवी जी को एक तरह से विरासत में मिला था। महादेवी जी में काव्य रचना के बीज बचपन से ही विद्यमान थे। छ: सात वर्ष की अवस्था में भगवान की पूजा करती हुई माँ पर उनकी तुकबन्दी:

ठंडे पानी से नहलाती
ठंडा चन्दन उन्हें लगाती
उनका भोग हमें दे जाती
तब भी कभी न बोले हैं
मां के ठाकुर जी भोले हैं।
...........................................

महादेवी के काव्य में भाव समृद्धि तथा शैल्पिक सौन्दर्य का आकर्षक समन्वय है। महादेवी वर्मा का काव्य अनुभूतियों का काव्य है। उसमें देश, समाज या युग का चित्रांकन नहीं है, बल्कि उसमें कवयित्री की निजी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति हुई है। उनकी अनुभूतियाँ प्रायः अज्ञात प्रिय के प्रति मौन समर्पण के रूप में हैं। उनका काव्य उनके जीवन काल में आने वाले विविध पड़ावों के समान है। उनमें प्रेम एक प्रमुख तत्व है जिस पर अलौकिकता का आवरण पड़ा हुआ है। इनमें प्रायः सहज मानवीय भावनाओं और आकर्षण के स्थूल संकेत नहीं दिए गए हैं, बल्कि प्रतीकों के द्वारा भावनाओं को व्यक्त किया गया है। कहीं-कहीं स्थूल संकेत दिए गए हैं।
पेश है हिन्दी साहित्य की महादेवी की रचनाएं 

          "जो तुम आ जाते एक बार"

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार
हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग
आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार
............................................

    "मुस्काते फूल"

वे मुस्काते फूल, नहीं
जिनको आता है मुर्झाना,
वे तारों के दीप, नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना।
वे नीलम के मेघ, नहीं
जिनको है घुल जाने की चाह,
वह अनन्त रितुराज, नहीं
जिसने देखी जाने की राह।
वे सूने से नयन, नहीं
जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज, नहीं
जिसमें बेसुध पीड़ा सोती।
ऐसा तेरा लोक, वेदना नहीं,
नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं,
नहीं जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार?
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरा मिटने का अधिकार
..........................................

   "मैं नीर भरी दुःख की बदली"

मैं नीर भरी दुःख की बदली,
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनो में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झनी मचली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वांसों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मैं क्षितिज भृकुटी पर घिर धूमिल,
चिंता का भर बनी अविरल,
रज कण पर जल कण हो बरसी,
नव जीवन अंकुर बन निकली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

पथ न मलिन करते आना
पद चिन्ह न दे जाते आना
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमटी कल थी मिट आज चली 
मैं नीर भरी दुःख की बदली !
.............................................................

महादेवी वर्मा वास्तव में नाम के अनुरूप ममतामयी, महीयसी थी। महादेवी वर्मा ने एक निर्भीक, स्वाभिमानी भारतीय नारी का जीवन जिया। राष्ट्र भाषा हिन्दी के सम्बन्ध में उनका कथन है ‘‘हिन्दी भाषा के साथ हमारी अस्मिता जुडी हुई है।




Poetry Recitals Shaam-e-Mahfil

जब होती है धुन कविता की तो शब्दों की इस दुनिया का एक अलग ही अहसास होता है।
शब्दों के समंदर में डूब जाने को मन करता है
जी हां दोस्तों एक ऐसा प्लेटफॉर्म द पोएट्री रिसाइटल्स जहाँ शब्दों के सागर में गोता लगातें हैं नये ज़माने के कवि
अगर आप भी है कविता प्रेमी तो हो जाइए रेडी
क्योंकि 2 अप्रैल को सजेगी महफिल डिग्गी पैलेस जयपुर में
जहां शब्द गुज़रेंगे कांधे को छूतें हुए। समां बंधेगा शाम-ऐ-महफिल में
शब्दों का सौन्दर्य आवाज़ के माध्यम से और जब आवाज़ हो शहर के जाने माने आरजे रविन्द्र की तो बात ही कुछ और .....
अनुज पारीक
धुन कविता की
DhunZindagiKi




Shaam-e-Mahfil २
2 April 2017
Time - 7 to 8 pm
Venue - Diggi Palace, Jaipur 

Saturday, 25 March 2017

खुद ही में खुद मुस्कुराता हूँ

ग़मों को छुपाता हूँ ,
खुद ही में खुद मुस्कुराता हूँ ...
खुद ही में तुमको छुपाता हुँ ,
होता हूँ  सेंटी , तो हंस कर दर्द छुपाता हूँ 
आज फिर बुना है मैने शब्दों का ताना बाना
तेरे दर्द को एक और शायरी में झलकाता हूँ
अनुज पारीक 
धुन ज़िन्दगी की 
धुन कविता की

Friday, 24 March 2017

महान कवि अवतार सिंह संधू "पाश"

23 मार्च शहीद दिवस महज़ 22-23 की उम्र में देश को आज़ाद कराने के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए थे ये वीर सपूत शहीद भगत सिंह, शहीद राजगुरु, शहीद सुखदेव। 
23 मार्च 1931 को इन वीर सपूतों को फांसी दी गयी थी देश की आज़ादी में इन शहीदों के बलिदान को देश हमेशा याद रखेगा।  
जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी दी थी और इसके 57 साल बाद 23 मार्च 1988 को एक और क्रांतिकारी और महान कवी अवतार सिंह संधू "पाश" की उन्हीं के गाँव में खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गयी। यह संयोग हो सकता है कि भगत सिंह के शहीद दिवस अर्थात 23 मार्च को ही पंजाब में पैदा हुए अवतार सिहं ‘पाश’ भी शहीद होते हैं।  यह वास्तव में भारतीय जनता की सच्ची आजादी के संघर्ष की परंपरा का सबसे बेहतरीन विकास है। यह शहादत राजनीति और संस्कृति की एकता का सबसे अनूठा उदाहरण है।   


उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग 
किसी दृश्य की तरह बचे 
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाँकी की 
देश सारा बचा रहा बाक़ी
..............................................................

देश के वीर सपूतों को को शत्-शत् नमन 

शहीददिवस पर पेश है महान कवि पाश की कविताएं 

अब विदा लेता हूं

अब विदा लेता हूं
अब विदा लेता हूं
मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूं
मैंने एक कविता लिखनी चाही थी
सारी उम्र जिसे तुम पढ़ती रह सकतीं
उस कविता में
महकते हुए धनिए का जिक्र होना था
ईख की सरसराहट का जिक्र होना था
उस कविता में वृक्षों से टपकती ओस
और बाल्टी में दुहे दूध पर गाती झाग का जिक्र होना था
और जो भी कुछ
मैंने तुम्हारे जिस्म में देखा
उस सब कुछ का जिक्र होना था
उस कविता में मेरे हाथों की सख्ती को मुस्कुराना था
मेरी जांघों की मछलियों ने तैरना था
और मेरी छाती के बालों की नरम शॉल में से
स्निग्धता की लपटें उठनी थीं
उस कविता में
तेरे लिए
मेरे लिए
और जिन्दगी के सभी रिश्तों के लिए बहुत कुछ होना था मेरी दोस्त
लेकिन बहुत ही बेस्वाद है
दुनिया के इस उलझे हुए नक्शे से निपटना
और यदि मैं लिख भी लेता
शगुनों से भरी वह कविता
तो उसे वैसे ही दम तोड़ देना था
तुम्हें और मुझे छाती पर बिलखते छोड़कर
मेरी दोस्त, कविता बहुत ही निसत्व हो गई है
जबकि हथियारों के नाखून बुरी तरह बढ़ आए हैं
और अब हर तरह की कविता से पहले
हथियारों के खिलाफ युद्ध करना ज़रूरी हो गया है
युद्ध में
हर चीज़ को बहुत आसानी से समझ लिया जाता है
अपना या दुश्मन का नाम लिखने की तरह
और इस स्थिति में
मेरी तरफ चुंबन के लिए बढ़े होंटों की गोलाई को
धरती के आकार की उपमा देना
या तेरी कमर के लहरने की
समुद्र के सांस लेने से तुलना करना
बड़ा मज़ाक-सा लगता था
सो मैंने ऐसा कुछ नहीं किया
तुम्हें
मेरे आंगन में मेरा बच्चा खिला सकने की तुम्हारी ख्वाहिश को
और युद्ध के समूचेपन को
एक ही कतार में खड़ा करना मेरे लिए संभव नहीं हुआ
और अब मैं विदा लेता हूं
मेरी दोस्त, हम याद रखेंगे
कि दिन में लोहार की भट्टी की तरह तपने वाले
अपने गांव के टीले
रात को फूलों की तरह महक उठते हैं
और चांदनी में पगे हुई ईख के सूखे पत्तों के ढेरों पर लेट कर
स्वर्ग को गाली देना, बहुत संगीतमय होता है
हां, यह हमें याद रखना होगा क्योंकि
जब दिल की जेबों में कुछ नहीं होता
याद करना बहुत ही अच्छा लगता है
मैं इस विदाई के पल शुक्रिया करना चाहता हूं
उन सभी हसीन चीज़ों का
जो हमारे मिलन पर तंबू की तरह तनती रहीं
और उन आम जगहों का
जो हमारे मिलने से हसीन हो गई
मैं शुक्रिया करता हूं
अपने सिर पर ठहर जाने वाली
तेरी तरह हल्की और गीतों भरी हवा का
जो मेरा दिल लगाए रखती थी तेरे इंतज़ार में
रास्ते पर उगी हुई रेशमी घास का
जो तुम्हारी लरजती चाल के सामने हमेशा बिछ जाता था
टींडों से उतरी कपास का
जिसने कभी भी कोई उज़्र न किया
और हमेशा मुस्कराकर हमारे लिए सेज बन गई
गन्नों पर तैनात पिदि्दयों का
जिन्होंने आने-जाने वालों की भनक रखी
जवान हुए गेंहू की बालियों का
जो हम बैठे हुए न सही, लेटे हुए तो ढंकती रही
मैं शुक्रगुजार हूं, सरसों के नन्हें फूलों का
जिन्होंने कई बार मुझे अवसर दिया
तेरे केशों से पराग केसर झाड़ने का
मैं आदमी हूं, बहुत कुछ छोटा-छोटा जोड़कर बना हूं
और उन सभी चीज़ों के लिए
जिन्होंने मुझे बिखर जाने से बचाए रखा
मेरे पास शुक्राना है
मैं शुक्रिया करना चाहता हूं
प्यार करना बहुत ही सहज है
जैसे कि जुल्म को झेलते हुए खुद को लड़ाई के लिए तैयार करना
या जैसे गुप्तवास में लगी गोली से
किसी गुफा में पड़े रहकर
जख्म के भरने के दिन की कोई कल्पना करे
प्यार करना
और लड़ सकना
जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त, यही होता है
धूप की तरह धरती पर खिल जाना
और फिर आलिंगन में सिमट जाना
बारूद की तरह भड़क उठना
और चारों दिशाओं में गूंज जाना -
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा
जिन्हें जिन्दगी ने बनिए बना दिया
जिस्म का रिश्ता समझ सकना,
खुशी और नफरत में कभी भी लकीर न खींचना,
जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फि़दा होना,
सहम को चीरकर मिलना और विदा होना,
बड़ी शूरवीरता का काम होता है मेरी दोस्त,
मैं अब विदा लेता हूं
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हें कभी आएगा नही
जिन्हें जिन्दगी ने हिसाबी बना दिया
ख़ुशी और नफरत में कभी लीक ना खींचना
जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फिदा होना
सहम को चीर कर मिलना और विदा होना
बहुत बहादुरी का काम होता है मेरी दोस्त
मैं अब विदा होता हूं
तू भूल जाना
मैंने तुम्हें किस तरह पलकों में पाल कर जवान किया
कि मेरी नजरों ने क्या कुछ नहीं किया
तेरे नक्शों की धार बांधने में
कि मेरे चुंबनों ने
कितना खूबसूरत कर दिया तेरा चेहरा कि मेरे आलिंगनों ने
तेरा मोम जैसा बदन कैसे सांचे में ढाला
तू यह सभी भूल जाना मेरी दोस्त
सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी
कि मैं गले तक जिन्दगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना
मेरी दोस्त मेरे भी हिस्से का जी लेना।
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         “सबसे ख़तरनाक

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना
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9 सितंबर 1950 को जन्मे पाश का मूल नाम अवतार सिंह संधु था। महज 15 साल की उम्र से ही  पाश ने कविता लिखनी शुरू कर दी और उनकी कविताओं का पहला प्रकाशन 1967 में हुआ। उन्होंने सिआड, हेम ज्योति और हस्तलिखित हाक पत्रिका का संपादन किया। पाश 1985 में अमेरिका चले गए। उन्होंने वहां एंटी 47 पत्रिका का संपादन किया। पाश ने इस पत्रिका के जरिए खालिस्तानी आंदोलन के खिलाफ सशक्त प्रचार अभियान छेडा।
पाश कविता के शुरुआती दौर से ही भाकपा से जुड गए। उनकी नक्सलवादी राजनीति से भी सहानुभूति थी। पंजाबी में उनके चार कविता संग्रह.. लौह कथा, उड्डदे बाजां मगर, साडे समियां विच और लड़ेंगे साथी प्रकाशित हुए हैं।  पंजाबी के इस महान कवि की महज 39 साल की उम्र में 23 मार्च 1988 को उनके ही गांव में खालिस्तानी आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। पाश धार्मिक संकीर्णता के कट्टर विरोधी थे। धर्म आधारित आतंकवाद के खतरों को उन्होंने अपनी एक कविता में बेहद धारदार शब्दों में लिखा है- मेरा एक ही बेटा है धर्मगुरु वैसे अगर सात भी होते वे तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते थे तेरे बारूद में ईश्वरीय सुगंध है तेरा बारूद रातों को रौनक बांटता है तेरा बारूद रास्ता भटकों को दिशा देता है मैं तुम्हारी आस्तिक गोलियों को अ‌र्ध्य दिया करूंगा..।
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जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी दी थी और इसके 57 साल बाद ‘पाश’ पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह आतंकवादियों की गोलियों का निशाना बने. यह संयोग हो सकता है कि भगत सिंह के शहीद दिवस अर्थात 23 मार्च को ही पंजाब में पैदा हुए अवतार सिहं ‘पाश’ भी शहीद होते हैं लेकिन इनके उद्देश्य व विचारों की एकता संयोग नहीं है. यह वास्तव में भारतीय जनता की सच्ची आजादी के संघर्ष की परंपरा का सबसे बेहतरीन विकास है. यह शहादत राजनीति और संस्कृति की एकता का सबसे अनूठा उदाहरण है.

जो लोग भगत सिंह और उनके साथियों के विचारों से थोड़ा भी परिचित हैं, वे जानते हैं कि उन्होंने एक ऐसे भारतीय समाज का सपना देखा था जो दमन, अत्याचार, शोषण व अन्याय जैसे मानव विरोधी मूल्यों से सर्वथा मुक्त हो तथा जहां सत्ता मजदूरों-किसानों के हाथों में हो. भगत सिंह के विचारों की रोशनी में देखें तो 15 अगस्त 1947 की आज़ादी की लड़ाई को जारी रखने तथा पूरी करने के लिए वे वैचारिक आवेग प्रदान करते हैं

पंजाबी साहित्य के क्षेत्र में नये पीढ़ी के कवियों ने पंजाबी कविता को नया रंग-रूप प्रदान किया. अवतार सिंह पाश इन्हीं की अगली पांत में थे

उनकी पहली कविता 1967 में छपी थी. अमरजीत चंदन के संपादन में भूमिगत पत्रिका ‘दस्तावेज’ के चौथे अंक में परिचय सहित पाश की कविताओं का प्रकाशन पंजाबी साहित्य के क्षेत्र में धमाके की तरह था. उन दिनों पंजाब में क्रांतिकारी संघर्ष अपने उभार पर था. पाश का गांव तथा इलाका इस संघर्ष के केन्द्र में था. उन्होंने इसी संघर्ष की जमीन पर कविताएं रचीं और इसके ‘जुर्म’ में गिरफ्तार हुए. करीब दो वर्षों तक जेल में रहकर सत्ता के दमन का मुकाबला करते हुए उन्होंने ढेरों कविताएं लिखीं वहीं रहते उनका पहला कविता संग्रह ‘लोककथा’ प्रकाशित हुआ जिसने पंजाबी कविता में उनकी पहचान दर्ज करा दी

1972 में जेल से रिहा होने के बाद पाश ने ‘सिआड’ नाम की साहित्यिक पत्रिका निकालनी शुरू की. पंजाब में क्रांतिकारी आंदोलन बिखरने लगा था. साहित्य के क्षेत्र में भी पस्ती व हताशा का दौर शुरू हो गया था. ऐसे में पाश ने आत्मसंघर्ष करते हुए सरकारी दमन के खिलाफ व जन आंदोलनों के पक्ष में रचनाएं की. पंजाब के लेखकों-संस्कृति कर्मियों को एकजुट व संगठित करने के प्रयास में पाश ने ‘पंजाबी साहित्य-सभ्याचार मंच’ का गठन किया तथा अमरजीत चंदन, हरभजन हलवारही आदि के साथ मिलकर ‘हेमज्योति’ पत्रिका निकाली. इस दौर की पाश की कविताओं में भावनात्मक आवेग की जगह विचार व कला की ज्यादा गहराई थी. चर्चित कविता ‘युद्ध और शांति’ उन्होंने इसी दौर में लिखी. 1974 में उनका दूसरा कविता संग्रह ‘उडडदे बाजा मगर’ छपा और तीसरा संग्रह ‘साडे समियां विच’ 1978 में प्रकाशित हुआ

उनकी मृत्यु के बाद ‘लड़ेगें साथी’ शीषर्क से चौथा संग्रह आया जिसमें प्रकाशित व अप्रकाशित कविताएं संकलित हैं. पाश की कविताओं का मूल स्वर राजनीतिक-सामाजिक बदलाव अर्थात क्रांति और विद्रोह का है. उनमें एक तरफ सांमती-उत्पीड़कों के प्रति जबर्दस्त गुस्सा व नफरत का भाव है, वहीं अपने जन के प्रति अथाह प्यार है


                  “हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिये
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिये
हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कंधों पर चढ़कर

हम लड़ेंगे साथी
कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़े घट्टों की कसम खाकर

हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले खुद नहीं सूंघते
कि सूजी आंखों वाली
गांव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्व से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाईयों का गला घोटने को मजबूर हैं
कि दफतरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर

हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है
जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी

और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता

हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं

हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे.
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