Friday, 18 August 2017

Yaadon Ki Giraft Me - Anuj Pareek


यादों की गिरफ्त में - अनुज पारीक  



Zabt Kaha Rahta Hai - Anuj Pareek



Junoon 
Manzil 
Zabt  

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Tuesday, 15 August 2017

Aazad Kaha Hun - Anuj Pareek

तूने तो भले कर दिया हो आज़ाद
पर आज़ाद कहां हूँ 
मैं तो आज भी तेरी यादों की गिरफ्त में हूँ 
अनुज पारीक



Sunday, 13 August 2017

Aazadi

आज़ादी आख़िर कब मिलेगी ?

कहने को तो हम 71 वा स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं !
लेकिन आज भी हम उन बेडियो में कैद है। क्यों आख़िर स्वतंत्र भारत में भी एक महिला एक बच्ची आज़ाद नहीं 
अगर सही मायने में आज़ादी मनानी है, तो आइए हम सब मिलकर एक ऎसे समाज का निर्माण करें जहां बेख़ौफ़ होकर हर एक बच्ची हर एक महिला अपने आप को सुरक्षित महसूस करें !

Do Respect To Women , Women is Our Charm                                                                               
Charm Of  Society , Charm Of India !


Saturday, 12 August 2017

Motivational Poem - Anuj Pareek




मैं कभी रुका नहीं - अनुज पारीक
MainKabhiRukaNahi - Anuj Pareek
Motivational Poetry Inspirational
DhunZindagi 

Thursday, 3 August 2017

Deshbhakti/ देशभक्ति -- Anuj Pareek

आ रही हूँ मगर अफसोस सिर्फ दिखावे की और # टैग की
#देशभक्ति
Anuj Pareek




देशभक्ति, Deshbhakti, August, 15August
Independence Day,  Anuj Pareek 

Sunday, 30 July 2017

Sab Tu Hai (Kalma, Namaz, Azaan) - Anuj Pareek

इश्क़ तेरा अज़्मत है
इबादतों की मसर्रतें है तू
खुदा तू खुद है मेरे लिए
कलमा, नमाज़, अज़ान सब तू है मेरे लिए
© अनुज पारीक

Ishq Tera Azmat Hai
Ibadaton ki masrarten hai Tu
Khuda Tu Khud hai mere liye
Kalma, Namaz, Azaan Sab Tu Hai Mere Liye --  © Anuj Pareek 

Khalwat - Anuj Pareek


हर मर्ज़ को मुस्कुराकर छुपाता हूँ
अपनों की भीड़ में भी अक्सर खुद को ख़ल्वत में पाता हूँ 
अनुज पारीक 

My Aim Is My BEER - Anuj Pareek

My AIM Is My BEER -- Anuj Pareek
Motivational Quotes
My Quote
My WORD Is My WORLD
DhunZindagi

Wednesday, 26 July 2017

Zabt Kaha Rahta hai Insan me - Anuj Pareek



जुनून हो चाहे कितना भी इंसान में
लाख जतन पर भी ना मिले मंज़िल
तो ज़ब्त कहां रहता है इंसान में
                      - अनुज पारीक 

Dhun Raksha Ki

जिनमे होती है धुन ... धुन बचाव की, धुन रक्षा की। ऐसे वीर जाबांज़ सैनिकों को सलाम।
#KargilVijayDiwas
धुन बचाव की
DhunZindagi




Monday, 24 July 2017

Urdu Poetry Kalma Namaz Azaan -- Anuj Pareek




कलमा, नमाज़, अज़ान सब तू है मेरे लिए -- अनुज पारीक 


Click For Poetry --- Dhun Kavita Ki 

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Sunday, 23 July 2017

Kalma Namaz Azaan -- Anuj Pareek

इश्क़ तेरा अज़्मत है    
खुदा तू खुद है मेरे लिए - अनुज पारीक
इबादतों की मसर्रतें है तू।
खुदा तू खुद है मेरे लिए 
कलमा, नमाज़, अज़ान सब तू है मेरे लिए।
             ©अनुज पारीक 
                                         

Friday, 21 July 2017

HMI (Human Machine Interface)

Medium to Interface = Human Machine Interface
manual instruction to convert results by HMI

HMI (Human Machine Interface) is a medium for information exchange and mutual communication between electromechanical system's and the user. It allows the user to complete settings through touchable images or keys on the user-friendly window. This not only offer's fast and convenient control of manufacturing automation, but also has replaced traditional controlling panel's which needextensive wiring.

HMI Example -- Mobile Phone, AC, Microwave, Washing Machine, Lift & many more electomechnical devices whose working on behave manual command or instruction

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तकनीक है तो तरक्की है - अनुज पारीक (धुन ज़िन्दगी की)


Technique Opens the way of Progress - Anuj Pareek (Dhun Zindagi Ki )



 

Tradition Love - Anuj Pareek









Love Shyari
Urdu poetry
Urdu Shyari
Explanation Love
Tradition Love
Poetry
Dhun Kavita ki
धुन ज़िन्दगी की
धुन कविता की

इश्क़ की तशरीह / Love Tradition , Explanation - Anuj Pareek



इश्क़ की क्या तशरीह दूँ
दिल तोड़ना तो रिवायत सी हो गई है -- Anuj Pareek
तशरीह - व्याख्या (Explanation)
रिवायत - परम्परा (Tradition)

Thursday, 20 July 2017

Khaab - Anuj Pareek



KHAAB- ANUJ
झूठा ही सही ख़्वाब अच्छा है 
ज़िन्दगी तेरा साथ अच्छा है। 
AnujPareek 
DhunZindagi 

Friday, 14 July 2017

Aashna Se Adawat - Anuj Pareek

आशना से अदावत -- अनुज पारीक

लो मान भी लिया 
बड़े मसरूफ़ रहते होंगे आप
लेकिन ये क्या आशनाओं से अदावत
और फेसबुकियों से बात
-- अनुज पारीक--



आशना -- परिचित 
अदावत -  वैर 
मसरूफ़ -  व्यस्त, busy 

Wednesday, 12 July 2017

SCADA / Supervisory Control and Data Acquisition / Automation

SCADA ---  Supervisory Control and Data Acquisition offers the ease of Monitoring of Sensors placed at distances, from one central location

The task of supervision of machinery and industrial processes on a routine basis can be an excruciatingly tiresome job. Always being by the side a machine or being on a 24x7 patrol duty around the assembly line equipment checking the temperature levels, water levels, oil level and performing other checks would be considered a wastage of the expertise of the technician on trivial tasks.

Supervisory Control first evolved in Electric utility systems when a need to operate remote substation equipment without sending in personnel or line crew at the remote site was felt.
General Electric and Control Corporation too developed their own independent supervisory control programs. These were used in pipelines, gas companies and even airports for runway landing lights. These systems became popular during 1950 and 1965. By that time, i.e. in 1960s Telemetry was developed for monitoring purposes.

Elements of SCADA (Supervisory Control and Data Acquisition)

SCADA monitors, controls and alarms the plant and/or regional facilities’ operating systems from a centralized location. It includes the communication of information between a SCADA central host computer, many scattered units and/or Programmable Logic Controllers.

SCADA Master Station Computer Systems: It is the repository of the real-time or near real-time reported data collected from the remote terminal units connected to it. It is generally standard computer hardware equipment and very few SCADA system suppliers have ventured out to make their own computer equipment. A few companies like IBM and CDC did try making hardware for it, but the effort was short lived and commercial off-the-shelf computer products continue to be the main stay. The back end SCADA software must be able to repeatedly poll the RTUs for data values, should have software for their retrieval, storage and processing. The processing may include unit conversion, cataloguing into tables etc.

Human-Machine Interface: 

This is the eye candy part on the host station. The values that have been stored in the host computers are presented to the human operator in an understandable and comprehensible form using HMIs. These may provide trending, diagnostic or management information and detailed schematics and animations representing the current states of the machines under its control. Pictorial representation being more understandable to humans is the preferred form in SCADA HMIs. 




खून खोल देने वाली कविता


खून खोल देने वाली कविता 


AmarnathAttack 
AmarNathTerrorAttack
Terrorism


                                   

दरिन्दों को कब इनकी भाषा में समझाओगे -- अनुज पारीक

दरिन्दों को कब इनकी भाषा में समझाओगे -- अनुज पारीक 

जो चैन अमन का पाठ पढ़ाते उन्हीं पर हुई है गोलीबारियां
कब तक, कब तक इनसे यूं पेश आओगे 
क्या कभी कोई सख्ती भी अपनाओगे 
समझाओं अब इनको इन्हीं की भाषा में 
दोस्ती, भाईचारा कब तक अपनाओगे
ये दरिंदे यूं ही छलनी करते रहेंगे सीना हमारे जवानों का 
या फिर उन निहत्थे निर्दोष इंसानों का 
और कब तक, कब तक कड़ी निंदा जताओगे 
इनको इन्हीं की भाषा में कब समझाओगे 

अनुज पारीक 
धुन ज़िन्दगी की 

Tuesday, 11 July 2017

Monday, 10 July 2017

Main Cigret To Nahi Peeta / मैं सिगरेट तो नहीं पीता -- अनुज पारीक

मैं सिगरेट तो नहीं पीता
हां मगर कुछ कश लेता हूँ सुकून के
---- © अनुज पारीक 

Saturday, 8 July 2017

I do not write for money - Anuj Pareek





                                                       मैं नहीं लिखता पैसों के लिए - अनुज पारीक 

 #Poetry #Writer #Author #Poet #Columnist 
#कवि #लेखक #कलमकार 
#धुन #आवाज़ #शब्द #पैसा #सच 
धुन #कविता की #धुन #ज़िन्दगी 
#DhunKavitaKi

#AnujPareek
#DhunZindagi 

Saturday, 1 July 2017

पागल कवि - कौतुहल मेरे मन की /PagalKavi

ज़िन्दगी क्या है ?
हम सब के मन में ये बात कभी ना कभी ज़रूर आती  है। या और भी कई ऐसे सवाल जो हमे ना सिर्फ परेशान बल्कि झकझोर कर देते हैं। सवालों में तो वैसे हर वक़्त उलझे रहते हैं। पर एक ऐसा सवाल जो हमे कई दफ़ा परेशान करता है और सोचने पर भी मज़बूर।
खासतौर पर तब जब हम किसी परेशानी में फंसे हो,जब जीवन दुखदायी हो।
कहीं से कोई उम्मीद की रोशनी दिखाई ना दे ऐसे समय में अक्सर हम इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं, की आखिर ये ज़िन्दगी है तो है क्या?
और जब ज़हन में ऐसे सवाल घर कर जाते हैं तो दिलों दिमाग के सारे घोड़ें दौड़ने लगते हैं।
ऐसे ही कई सवालों ने घेरा बना लिया था उस पागल कवि के मन में ........
तो आइये दोस्तों धुन ज़िन्दगी पर आज हम जानेंगे
ऐसे ही सवालों के जवाब क्योकि धुन ज़िन्दगी पर
मैं आपका दोस्त अनुज पारीक लेकर आता हूँ।
जानकारी का खज़ाना और भी बहुत कुछ ....
साथ ही आपको रुबरु करवाता हूँ। धुन संवार लोगों से
क्योकि ज़िन्दगी में किसी मुक़ाम तक जाना हो या किसी भी मंज़िल को पाना हो ज़रूरी है।
धुन.... धुन ज़िन्दगी की ..
तो आइए जानते हैं "कौतुहल मेरे मन की"


दरअसल ये कौतुहल सिर्फ मेरे मन की नहीं है।
ये हर उस इंसान के मन की है जो ज़िंदा है और ढूंढने की कोशिश करता है इन सवालों के जवाब...
उस रात, उस लेखक की परछाईं अधपकी नींद से उठ खड़ी हुई। बगल में कलम पड़ी थी।
दिलों-दिमाग पर शब्दों और ख़्यालों का पहरा लगा था।  फिर क्या था, उसके ‘मन की कौतुहल’ में एक रवानी जागी। उसके उबलते शब्दों ने आखिरकार लिख ही डाला।
वो दिल्ली का दर्द,  वो मांझी का मर्ज़, वो उस अहंकारी मानव का सच, वो उस श्मशान की बुझी ख़्वाहिश, वो उस ज़िद्दी धुआँ की फ़रमाइश,
वो उस दिवाली की अंधेरी रात, वो उस सन-सैतालिस की बेबस बात, वो उस प्यासे कवि की गुहार,
वो उस कल्करूपी की पुकार, वो उस आशिक की ज़रूरत,  वो उस नोटबन्दी की हुकूमत, वो उस रेलगाड़ी के तमाशे, वो उस सड़क पे पड़ी खूनी लाशें।
वो मानवीय भावनाओं की सिसिकियों के भँवर में जा फँसा था। शब्दों का समुंदर उसके गले तक जा भरा था। उन कड़वे और ज़हर शब्दों की उल्टियाँ करना बेहद ही ज़रूरी था। यह काव्य-रचना ज़रूरी थी। उस ''पागलकवि की कल्पना" के रसद को चखना जरूरी था।
अब तो आप जान ही चुके होंगे वो सवाल जो उस पागल कवि के मन में थे। लेकिन हां अभी भी जवाब
बाकी है और जवाब मिलेंगे आपको पागल कवि कल्पना के रसद को चखने के बाद ...
तो आज ही आर्डर करें अमित सिंह द्वारा लिखी
"कौतुहल मेरे मन की"

Amazon 

Infibeam 



Book Review by
ANUJ PAREEK
(Radio Presenter, Creative Writer, Poet)

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Friday, 30 June 2017

नागार्जुन/ Nagarjun /Great Poet Nagarjun

30 जून 1911 के दिन ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का चन्द्रमा हिन्दी काव्य जगत के उस दिवाकर के उदय का साक्षी था, जिसने अपनी फ़क़ीरी और बेबाक़ी से अपनी अनोखी पहचान बनाई।

नागार्जुन ने 1945 ई. के आसपास साहित्य सेवा के क्षेत्र में क़दम रखा। शून्यवाद के रूप में नागार्जुन का नाम विशेष उल्लेखनीय है। नागार्जुन का असली नाम 'वैद्यनाथ मिश्र' था।
हिन्दी साहित्य में उन्होंने 'नागार्जुन' तथा मैथिली में 'यात्री' उपनाम से रचनाओं का सृजन किया।

कबीर की पीढ़ी का यह महान कवि नागार्जुन के नाम से जाना गया। मधुबनी ज़िलेके 'सतलखा गाँव' की धरती बाबा नागार्जुन की जन्मभूमि बन कर धन्य हो गई। ‘यात्री’ आपका उपनाम था और यही आपकी प्रवृत्ति की संज्ञा भी थी। परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने वाले बाबा नागार्जुन हिन्दी, मैथिली, संस्कृत तथा बांग्ला में कविताएँ लिखते थे।

मैथिली भाषा में लिखे गए आपके काव्य संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिन्दी काव्य-मंच पर अपनी सत्यवादिता और लाग-लपेट से रहित कविताएँ लम्बे युग तक गाने के बाद 5 नवम्बर सन् 1998 को ख्वाजा सराय, दरभंगा, बिहार में यह रचनाकार हमारे बीच से विदा हो गया।

उनके स्वयं कहे अनुसार उनकी 40 राजनीतिक कविताओं का चिरप्रतीक्षित संग्रह ‘विशाखा’ आज भी उपलब्ध नहीं है। संभावना भर की जा सकती है कि कभी छुटफुट रूप में प्रकाशित हो गयी हो, किंतु वह इस रूप में चिह्नित नहीं है। यानि तीसरा संग्रह अब भी प्रतीक्षित ही मानना चाहिए। हिंदी में उनकी कई काव्य पुस्तकें हैं।
ये सभी जानते हैं. उनकी प्रमुख रचना-भाषाएं मैथिली और हिंदी ही रही हैं। मैथिली उनकी मातृभाषा है और हिंदी राष्ट्रभाषा के महत्व से उतनी नहीं जितनी उनके सहज स्वाभाविक और कहें तो प्रकृत रचना-भाषा के तौर पर उनके बड़े काव्यकर्म का माध्यम बनी। अबतक प्रकाश में आ सके उनके समस्त लेखन का अनुपात विस्मयकारी रूप से मैथिली में बहुत कम और हिंदी में बहुत अधिक है। अपनी प्रभावान्विति में ‘अकाल और उसके बाद’ कविता में अभिव्यक्त नागार्जुन की करुणा साधारण दुर्भिक्ष के दर्द से बहुत आगे तक की लगती है। 'फटेहाली' महज कोई बौद्धिक प्रदर्शन है। इस पथ को प्रशस्त करने का भी मैथिली-श्रेय यात्री जी को ही है।

नागार्जुन को 1965 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से उनके ऐतिहासिक मैथिली रचना पत्रहीन नग्न गाछ के लिए 1969 में नवाजा गया था। उन्हें साहित्य अकादमी ने 1994 में साहित्य अकादमी फेलो के रूप में सम्मानित किया।

तो आइये आज इस महान जनकवि की 106 वीं जयंती पर पढ़ते है
सत्य, बातें और भी कई  कविताएं….


सत्य

सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी-फटी आँखों से
टुकुर-टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए-जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फ़र्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा-सारा दिन, सारी-सारी रात

सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग़ की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया है
कौर अंदर डालकर जबड़ों को झटका देना पड़ता है
तब जाकर खाना गले के अंदर उतरता है
ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सत्य को लकवा मार गया है

वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा-सारा दिन, सारी-सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक
लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है

जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है
उसे इमर्जेंसी का शाक लगा है
लगता है, अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ, सत्य अब पड़ा रहेगा
लोथ की तरह, स्पंदनशून्य मांसल देह की तरह!

बातें

बातें -
हँसी में धुली हुईं
सौजन्य चंदन में बसी हुई
बातें -
चितवन में घुली हुईं
व्यंग्य बंधन में कसी हुईं
बातें -
उसाँस में झुलसीं
रोष की आँच में तली हुईं
बातें -
चुहल में हुलसीं
नेह-साँचे में ढली हुईं
बातें -
विष की फुहार-सी
बातें -
अमृत की धार-सी
बातें -
मौत की काली डोर-सी
बातें -
जीवन की दूधिया हिलोर-सी
बातें -
अचूक वरदान-सी
बातें -
घृणित नाबदान-सी
बातें -
फलप्रसू, सुशोभन, फल-सी
बातें -
अमंगल विष-गर्भ शूल-सी
बातें -
क्य करूँ मैं इनका?
मान लूँ कैसे इन्हें तिनका?
बातें -
यही अपनी पूँजी, यही अपने औज़ार
यही अपने साधन, यही अपने हथियार
बातें -
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
बना लूँ वाहन इन्हें घुटन का, घिन का?
क्या करूँ मैं इनका?
बातें -
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
स्तुति करूँ रात की, ज़िक्र न करूँ दिन का?
क्या करूँ मैं इनका?


उनको प्रणाम!

जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम।

कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए!
उनको प्रणाम!

जो छोटी-सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि-पार,
मन की मन में ही रही, स्वयं
हो गए उसी में निराकार!
उनको प्रणाम!

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह-रह नव-नव उत्साह भरे,
पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे!
उनको प्रणाम

एकाकी और अकिंचन हो
जो भू-परिक्रमा को निकले,
हो गए पंगु, प्रति-पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले!
उनको प्रणाम

कृत-कृत नहीं जो हो पाए,
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल!
उनको प्रणाम!

थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ,
या जन्म-काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहाँत हुआ!
उनको प्रणाम

दृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति-मंत?
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत!
उनको प्रणाम!

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर-चूर!

उनको प्रणाम!



भूल जाओ पुराने सपने


सियासत में
न अड़ाओ
अपनी ये काँपती टाँगें
हाँ, मह्राज,
राजनीतिक फतवेवाजी से
अलग ही रक्खो अपने को
माला तो है ही तुम्हारे पास
नाम-वाम जपने को
भूल जाओ पुराने सपने को
न रह जाए, तो-
राजघाट पहुँच जाओ
बापू की समाधि से जरा दूर
हरी दूब पर बैठ जाओ
अपना वो लाल गमछा बिछाकर
आहिस्ते से गुन-गुनाना :
‘‘बैस्नो जन तो तेणे कहिए
जे पीर पराई जाणे रे’’
देखना, 2 अक्टूबर के
दिनों में उधर मत झाँकना
-जी, हाँ, महाराज !
2 अक्टूबर वाले सप्ताह में
राजघाट भूलकर भी न जाना
उन दिनों तो वहाँ
तुम्हारी पिटाई भी हो सकती है
कुर्ता भी फट सकता है

हां, बाबा, अर्जुन नागा !

Tuesday, 27 June 2017

मैं नहीं लिखता पैसों के लिए -- अनुज पारीक



नहीं लिखता मैं पैसों के लिए 
ना  ही लिखता हूँ नाम के लिए 
मैं तो लिखता हूँ सिर्फ सुकून के लिए 
लिखने की प्यास को शांत करने के लिए 

लिखता हूँ सिर्फ अच्छाई के लिए 
लिखता हूँ बदलाव के लिए 
नहीं लिखता हूँ मैं पैसों के लिए 

या फिर सिर्फ यही एक रास्ता है 
नाम के लिए, पहचान के लिए 
मैं तो लिखता हूँ 
ज़िंदा रहने के लिए 
या फिर जीने के लिए 
लिखता हूँ मैं जो शब्द ज़हन में है मेरे 
नहीं लिखता मैं पैसों के लिए ......

लिखता हूँ मैं उस गरीब की आवाज़ के लिए 
लिखता हूँ उस गली के कचरा बीनने वाले के लिए 
लिखता हूँ उस दुखी अन्नदाता किसान के लिए 
नहीं लिखता मैं पैसों के लिए 
ना  ही लिखता हूँ नाम के लिए 

लिखता हूँ उनके लिए 
जिनकी आवाज़ को दबा दिया 
गरीब का नाम देकर 
कमज़ोर का नाम देकर 
एक सच्चा कलमकार हूँ 
लिखता नहीं नाम, दौलत, शौहरत या फिर हवस के लिए ..
जब तक ज़िंदा हूँ लिखता रहूंगा 
उस अनाथ के लिए 
उस मज़बूर किसान के लिए 
क्योकि  नहीं लिखता मैं पैसों के लिए 
ना  ही लिखता हूँ नाम के लिए ....
© अनुज पारीक 

Saturday, 24 June 2017

Dhun

ज़िन्दगी में किसी मंज़िल तक जाना हो या किसी मुक़ाम को पाना हो ज़रूरी है धुन
DhunZindagi

AIM
Target
Success
Achive
Dream

Sun Zara / सांसों की आहट तो सुन ज़रा - अनुज पारीक

उदासियां तू भी तो सुन ज़रा
बेवजह मत लगा खामोशियों का इल्ज़ाम मुझ पर
सांसों की आहट तो सुन ज़रा
Dhun Poetry
MyWORDIsMyWORLD
DhunZindagi

Saturday, 17 June 2017

परिवार का ख़्याल जो हरदम सताता - अनुज पारीक / Father Poetry Anuj Pareek

फटी एड़ियां 
घिसी चप्पलें 
पसीने से भी रहता तर-बतर
खूब पसीना मेहनत करता 
परिवार की ज़रूरतें ही नहीं बच्चों की ख़्वाहिशें भी पूरी करता
मुस्कुराकर हर दर्द छुपाता 
पूछने पर बस कुछ नहीं यूं ही हर मर्ज़ छुपाता
तपती धूप में मेहनत से शायद इसलिए भी जी नहीं चुराता 
परिवार का ख़्याल जो हरदम सताता
खूब पसीना बहाता 
मेहनत करता 
परिवार की ज़रूरतें ही नहीं बच्चों की ख़्वाहिशें भी पूरी करता
पाई-पाई जोड़कर जो भी थोड़ा बहुत बचाता 
फिर भी पूरा कुछ ना हो पाता
पता नहीं कैसे हिम्मत जुटाता 
कहीं से उधार कहीं ब्याज़ से पैसा वो लाता
बेटी का ब्याह भी रचाता 
बेटे को भी पढ़ा- लिखाकर क़ाबिल बनाता
खूब पसीना बहाता 
मेहनत करता 
परिवार की ज़रूरतें ही नहीं बच्चों की ख़्वाहिशें भी पूरी करता ।।
--  © अनुज पारीक --
 Anuj Pareek
Creative Writer,Poet

अन्नदाता / Kisan - Anuj Pareek

सियासत ने भी क्या खेल रचाया
निवाला देने वालों का ही खून बहाया
--- अनुज पारीक ---

पिता / Father

परिवार की शान है पिता
त्याग और समर्पण की खान है
पिता महज़ शब्द नहीं पूरा आसमान है

#Father #FatherLove #Papa #MerePapa
#FathersDay #Poetry 

Thursday, 8 June 2017

Feel Soul / ना तू अजनबी - अनुज पारीक


ना तू अजनबी है न मैं तेरे लिए अजनबी 
रूह से महसूस कर ज़रा इस रिश्ते को 
©अनुज पारीक 

Monday, 5 June 2017

Poetry On Environment / पर्यावरण की हत्या – अनुज पारीक


विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर पेश है मेरी ये कविता

अपने ही हाथों कर रहे है पर्यावरण की हत्या
पेड़ पौधों हरयाली को छोड़ कर रहे है दीवारों की रक्षा
काट रहे है पेड़ों को कर रहे है जंगलों का नाश
जो नहीं चेते अभी भी तो
हो जायेगा सब खाक जल की बूंद-बूंद को तरसेंगे हम और आप !
अनुज पारीक

#WorldEnvironmentDay
विश्व पर्यावरण दिवस
पर्यावरण की हत्या – अनुज पारीक
Poetry on World Environment Day 
Nature 
Love Nature 
NatureLover 
Dhun #SaveNature 
#SaveEnvironment
Environment Poetry by Anuj Pareek 


Sunday, 4 June 2017

Go Green Everyday Environment Day - AnujPareek

तापमान पहुंचा 50 के पार
.सी. नहीं है बचने का आधार
खुद को और आने वाली पीढ़ी को अगर विनाश से है बचाना
तो पेड़ ज़रूर लगाना - अनुज पारीक 

धुन बचाव की #SaveEnvironment #GoGreen 



आज बढ़ रहें तामपान के ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ हम है
50 के पार तो पहुँच चुका है, आने वाले कुछ ही सालों में शायद 60 या इसके भी पार
ज़रा सोचिये अपने बच्चों के बारे में कैसे सहन कर पाएंगे इतनी गर्मी क्या वो कभी माफ़ कर पाएंगे आपको
पेड़ लगाएं
आने वाले कल के लिए
अपने बच्चों के लिए 
GoGreen Dhun Bachaav Ki 


प्रकृति के विनाश से बचने का एक ही है विकल्प
पेड़ लगाने का लेना होगा संकल्प - अनुज पारीक 
धुन बचाव की #SaveEnvironment #GoGreen 


ना करों जंगलों का नाश 
हो जाएगा सब-कुछ ख़ाक 
जल की बूंद-बूंद को तरसेंगे हम और आप
अनुज पारीक 
धुन ज़िन्दगी की 
धुन बचाव की 
#EveryDayEnvironmentDay
AnujPareek 
DhunZindagiKi 
#Save #Dhun 




Saturday, 3 June 2017

Digital filmmaking


इन दिनों डिजिटल फिल्ममेकिंग बहुत ही चर्चा में है लोग फिल्म या शार्ट मूवी बनाते है फिर उसे यूट्यूब या सोशल मीडिया साइट्स फेसबुक,ट्विटर इंस्टाग्राम पर अपलोड करते हैं
अगर आज के इस दौर में डिजिटल फ़िल्ममेकिंग में करियर और इनकम की बात की जाए तो करियर के अच्छे चांस है और इनकम भी बढ़िया है
इन दिनों आ रहे High-Resolution मोबाइल कैमराज और DSLR के जरिये फिल्ममेकिंग आज एक आसान हो गयी है
और इसकी क्वालिटी भी बेहतर मिलती है
अगर आप भी डिजिटल फिल्म मेकिंग में करियर बनाना चाहते हैं तो डिजिटल फिल्म मेकिंग में किसी  अच्छे इंस्टिट्यूट से ट्रेनिंग लेकर डिजिटल फिल्म मेकर बन सकते है
जहाँ फिल्म मेकिंग से जुड़ी प्रैक्टिकल लर्निंग पर पूरा फोकस रहेगा सिर्फ फिम मेकिंग ही नहीं, पोस्ट प्रॉडक्शन, सोशल साइट्स पर अपलोड करना, इसके डिस्ट्रीब्यूशन और इससे अच्छी इनकम कमाने के बारें में भी ट्रेंड किया जाता है

Nazren / नज़रें - Anuj Pareek

                                                                अगर नज़रें रूकती है तो रुक जाने दो
                                                                   नज़रों का काम ही है नज़र करना
                                                                                    -अनुज पारीक 

World Environment Day/ विश्व पर्यावरण दिवस

दुनियाभर में 5 जून को पर्यावरण दिवस यानी विश्व पर्यावरण दिवस World Environment Day के रूप में मनाया जाता है। 
आखिर ऐसी क्या वजह थी क्या ऐसे कारण रहें की पर्यावरण दिवस मनाने की ज़रुरत हुई और इस दिन को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में पूरी दुनिया में 5 जून को मनाया जाने लगा
तो आइये जानते है किन कारणों को देखते हुए समाज के जागरूक लोगो ने एनवायरनमेंट डे मनाने को सोचा। 
पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया। 


इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का जन्म हुआ तथा प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। तथा इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को प्रेरित करना था।   
वनों की कटाई और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते स्तर को देखते हुए
पर्यावरण मुद्दों के बारे में आम लोगों को जागरुक बनाने के लिये
सुरक्षित, स्वच्छ और अधिक सुखी भविष्य का आनन्द लेने के लिये


आज बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग को देखते हुए अगर हमें आने वाली पीढ़ी को प्रकृति के विनाश से बचना है तो सिर्फ इस दिवस को मनाने इस डे को सोशल नेटवर्किंग पर पोस्ट करने और औपचारिकता से पार नहीं पड़ने वाली हम सबको अपने घर ऑफिस अपने आस-पास के परिवेश में पेड़ लगाने होंगे उनकी सुरक्षा व देखभाल करनी होगी। 

Anuj Pareek 
Dhun Zindagi Ki 
धुन बचाव की 







Wednesday, 31 May 2017

Zindagi Ko Ha, Tobacco Ko Na - Anuj Pareek

कहीं धुँआ कहीं राख
ज़िंदगी हुई ख़ाक

कहें ज़िंदगी को हां, तम्बाकू को ना

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस
31 मई


No Tobacco
WorldNoTobacooDay

ज़िंदगी को धुँए में न उड़ाएं
Anuj Pareek 

Sunday, 28 May 2017

Menstrual/ कही दर्द , पीड़ा से गुजरती होंगी

दर्द , बैचेनी पीड़ा से छटपटाती
मन में अजीब सी चिड़चिड़ाहट
कुछ ना खाने को मन करना
ज़रा सी बात पर रो देना
शायद ऐसा ही कुछ होता होगा ना
महीने के उन चार दिनों में
समझता हूँ तेरे चेहरे की लकीरों से
कही दर्द , पीड़ा से गुजरती होंगी
#MenstrualHygieneDay
Anuj Pareek 

Wednesday, 24 May 2017

Zindagi / ज़िन्दगी


                           अंधेरों के बीच से ज़िन्दगी ने कहा कि देखों उजास हो रहा है -- AnujPareek

Tuesday, 23 May 2017

Hope


आशा की एक किरण जीने की एक राह...
Anuj Pareek

Thursday, 18 May 2017

Maa










एक तू ही है की जिसने
मेरी पीड़ा को छावं दी
वरना
टूट गया था मैं तो
हर बार हर लम्हा हर पल सम्भाला तूने वरना
इतनी शानो शौकत से कहा खड़ा कर पता अपने आप को
एक तू ही तो थी माँ जिसने बार-बार हर बार संवारा मुझे
हर डगर हर राह पर तूने ही तो हौसला बढ़ाया था मेरा !

Anuj Pareek

Wednesday, 17 May 2017

Safar Reshmi Sapno Ka / सफ़र रेशमी सपनों का

ज़िन्दगी में सपनो को पूरा करने के लिए धुन का होना ज़रूरी है। और जब होती है धुन कुछ करने की या कुछ कर गुजरने की तो मुश्किल से मुश्किल डगर पर भी चलना आसान हो जाता है।
तो आइये दोस्तों चलते है उस सफ़र की ओर जो आज सुहाना तो है लेकिन उस सफ़र को तय करने के लिए कितनी कड़ी डगरों से गुज़रना पड़ा होगा।
उन सपनों को पूरा करने के लिए कितनी रातों को जागना पड़ा होगा। जी हां दोस्तों धुन ज़िन्दगी पर आज मैं अनुज लेकर आया हूँ एक ऐसे ही सफ़र की दास्ताँ ....... सफ़र रेशमी सपनों का............



सफ़र रेशमी सपनों का महज एक किताब नही, गरोठ कस्बे में रहने वाली "वर्षा गुप्ता" द्वारा लिखे गए वो सपने है जो खुली आँखों से देखते तो है पर पलके तब तक झपकने नही देते जब तक वो मुकम्मल न हो जाए। सफ़र में कठिनाइयाँ न हो तो मंजिल को पाने का क्या मजा। 2012 में कलम उठाई और लिख डाला अपना पहला काव्य संग्रह।
इस सफ़र में वर्षा गुप्ता को भी कई संघर्ष करने पड़े पर कभी हिम्मत न हारी।
यह प्रेरणादायी किताब हमे सिखाती है की किस तरह हौसला रख हमे मंजिल को हर हाल में पाना है, क्योंकि लेखिका का मानना है की" हार मान लेने से ही हार होती है" और इसी पर अटल रहकर कुछ किया जाए तो कुछ भी मुश्किल नही है। इसके अलावा भी जिंदगी के छोटे छोटे पहलुओं पर कलम चलाई है।
इसमें माँ की महत्ता भी है तो पिता का प्यार नही, चाँद सितारों की दुनिया भी है और बिना मात्राओं  की कविताएं भी।
ज़िन्दगी के कड़वे मीठे रहस्यों को काफी अच्छी तरह से सामने रखने की कोशिश की है किताब में दस विषय है जिनमे सारी कविताए समाहित की गई है और वही किताब का मनमोहक पृष्ठ इसे पड़ने के लिए विवश कर देता है। बेहतरीन काव्य संग्रह के लिए लेखिका को बधाई।

Yaaden

                                     यादें वार करती है जिस्म की सभी कोशिकाओं पर

Wednesday, 3 May 2017

Mr Stylo Creation



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